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सफाई का भूत
December 29, 2018 • Delhi Search

व्यंग्य

-सुशील यादव-

गनपत सुबह सुबह कार्ड ले के आया।
कार्ड देखते ही हमको लगता है, सौ से पांच सौ की बलि चढ़ने का परवाना आ गया।
हमने अखबार को तह करते हुए पूछा, सुबह सुबह ये क्या लिए फिर रहे हो?
उसने कहा, गुरुजी माफ करें, हमने इस कार्ड में आपका नाम डाल रखा है, वो भी बिना आपसे पूछे?

हमने अपनी तिरछी निगाह कार्ड की तरफ फेंकते हुए, चश्मा साफ करके कहा,
क्या बात है कार्ड में, देखे जरा। उसने कार्ड बढाते हुए कहा, गुरुजी हम एक किराया भंडार खोलने जा रहे हैं आपको उसका कल उदघाटन करना है।
हम कार्ड को लिफाफे से मुक्त कर चुके थे।
हमारे सामने कार्ड का मजनूंन था ‘सफाई किराया भंडार शीतला वार्ड, खाम तालाब....। फिर नीचे छोटे फांट में किराया भंडार खोलने के उद्देश्य और विशेषताएं छपी थी।’
हमारे यहां देशव्यापी सफाई अभियान को मद्देनजर रख के सफाई में लगने वाले सामान किराए पर तत्काल उपलब्ध कराये जाने की व्यवस्था हैं।
हम झाड़ू, फावड़ा, बेलचा, तगाड़ी, कुदाल .गैंती, कचरा ट्राली, मंगवाई गई जगह पर उपलब्ध करा देंगे।

बड़े सफाई अभियान में लगे सरकारी, गैर सरकारी कार्यालय को ट्रेक्टर, लोडर या अन्य बड़ी मशीन के लिए आर्डर सप्ताह भर पहले देना होगा।
कार्य कुशल सफाई करने वाले दिहाड़ी स्त्री् पुरुष भी आर्डर पर भेजे जायेंगे।ड्रेस कोड के लिए चार्ज अलग से लगेगा।
नोट: 1. राजनीतिक दल वालों से अनुरोध है कि संभावित किराए की पूरी राशि एवं इस्तेमाल किये जाने वाले अनुमानित सामग्री की धरोहर राशि अडवांस में जमा करना अनिवार्य होगा अन्यथा निर्धारित सेवाए देने के लिए, व्यवस्था का अनुपालन करना हमारे लिए संभव नहीं होगा।
2. यदि फोटोग्राफी चाहते हैं, तो क्लोसअप में लिए जाने वाले चेहरों की शिनाख्त के लिए फोटो संचालक के पास जमा करवाये।
उद्घाटनकर्ता में, श्री के बाद खुद का नाम देखकर, मैं गनपत की तरफ मुखातिब हुआ, भइये, ये सब क्या खुरापात है?करना क्या चाह रहे हो....? मेरे पल्ले तो कुछ भी नहीं पड रहा है।
गनपत ने समझाना शुरू किया।
गुरुजी आप ये जो अखबार मोड़ कर अभी अभी जो रखे हैं, देख लीजिये कोने् कोने सफाई की खबरों से भरा हुआ है।सरकारी दफ्तर, गली मुहल्लों, कालोनियों में सफाई करने कराने की होड़ सी मची हुई है।

दरअसल हम बीबी की फरमाइश पर झाड़ू लेने निकले थे।उनकी इसी नेक्निस्वार्थ फरमाइश को पूरा करने में हमे आत्म संतोष सा होता है।हम सोचते हैं इतने ही लिमिट के काश सभी फरमाइशे हुआ करते।

खैर, उस दिन दूकान्दूकान पूछ्पूछ के थक गए, सब ने एक जवाब दिया कल दो अक्टूबर था न, पूरे के पूरे झाड़ू थोक-थोक में लोग लेते गए हैं।अगला स्टाक मंगवाया है आते ही ले जाइयेगा।
बस इसी से हमारी ट्यूब लाईट को, चोक वाली बिजली मिल गई।हमने सोचा इस सफाई का स्कोप भविष्य में कम से कम, आने वाले पाच सालों में कम नहीं होने का।
हमने झटपट इन्वेस्ट करने का प्लान बना लिया।अभी पचास का इन्वेस्ट किया है।बाद में इसमे इजाफा करंगे।पेड़ इम्प्लाई भी रखेंगे।इसके नेवी और एयर विंग भी चालू करंगे।

मै चैका नेवी, एयर विंग.....वो कैसा क्यां....?

गुरुजी! गंगा की नहीं सुने.....?
गंगा सफाई करने के बाद जनता की मांग लोकल नदियों, तालाबों की सफाई की तरफ होगी न.... वई तो.....?
और वो एयर विंग.......
गुरुजी..... आप को सब पता रहता है, विज्ञान सिज्ञान आप पढ़े रहते हैं।हमसे पूछते हैं। देखते नहीं कितना पोलुशन होते रहता है।सफाई तो वहां भी चाहिए की नइ.....?
मै गनपत के गणित में उलझ सा गया।
मेरे पास, उसकी इच्छा शक्ति के आगे, काटने लायक तर्क की गुजाइश बाकी न रह गई थी...।
मैंने उससे पूछ लिया, कल धुले कपडे में आऊ या रोजाना वाला चलेगा, वैसे ये मेरा पहला उदघाटन है, मुझे अच्छा ही पहनना पड़ेगा,
गनपत! कहीं तुम उद्घाटन बाद सफाई अभियान में तो नहीं लगा दोगे......?
सफाई का भूत गनपत से उतर के मुझ पर चढ़ गया।
गनपत प्रस्थान बाद, कल के भाषण के लिए, महीने भर के सफाई कालम वाले, अखबार में खंगालने लगा।