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परोपकार की भावना से युक्त होता है भगत
May 16, 2019 • Delhi Search

भक्त की पहचान विशालता, नम्रता, दया, करुणा, नेकी और प्रेम जैसे दिव्य गुणों से होती है। वह संसार की बजाय सत्य परमात्मा को प्रधानता देता है, इसलिए, उसके जीवन की महत्ता बनती है वरना जीने को लोग लंबी उम्र जी लेते हैं लेकिन उनके जीवन का कोई मोल नहीं पड़ता। भक्त परमात्मा की बंदगी करते हुए, अपनी तमाम सांसारिक जिम्मेदारियों को निभाते हुए जीवन का सफर तय करता है, वह आनंद भी प्राप्त करता है और अपने जीवन के म्यार को भी ऊँचा करता है।
वह खुदगर्जियों से ऊंचा उठ जाता है, वह तंगदिल नहीं होता, वह मानव मात्र को अपना परिवार मानता है, इसलिये, वह सम्पूर्ण संसार के उद्धार के लिये खुद को समर्पित करता चला जाता है। । यह योगदान तभी संभव हो पाता है। जब 'वसुधैव कुटुम्बकम' यानि धरती पर बसने वाले इंसान एक मालिक की संतान हैं, की भावना मन में बस जाती है। साकत और मनमुख केवल अपने बारे में सोचते हैं, वह खुद पर ही केंद्रित रहते हैं, इसलिये उनमें खुदगर्जियां पाई जाती हैं लेकिन भक्त
के मन में सबकी सेवा करने का और दु:ख बांटने का भाव होता है। वह । परोपकार की भावना से युक्त होकर बंदगी भी करता है और औरों के लिये भी सुकून, चैन और कल्याण का साधन बन जाता है, इसलिये, उसकी तुलना वृक्ष से की जाती हैं जिसकी छाया, पत्तियां और टहनियां सब औरों के ही कामं आती हैं। उसकी तुलना बहती हुई नदी से की जाती
है जो पानी देकर कितनों की खेती लहलहा देती है, जो कितनों के लिये अनाज पैदा करवा देती है, जिसे इंसान और जीव जंतु ग्रहण करते हैं। जो परमात्मा के साथ जुड़कर इसे जीवन में विशेषता देते हैं, इसे आधार मानते हैं, इसी का नूर घट-घट में देखते हैं, उनके जीवन में वह निखार आ जाता है जो जिस्मानी खूबसूरती से लाख गुना बेहतर होता है।
बेहतर इंसान वही होता है जो अपने जीवन को निखारता है, जो औरों के लिये कल्याणकारी हो जाता है, वह जान जाता। है कि किन भावनाओं को हृदय में बसाना है और किन भावनाओं को भूलकर भी अपने मन में स्थान नहीं देना है। जैसे ही कोई मक्खी या मच्छर हमारे जिस्म पर बैठता है तो उसे उड़ाने के लिये झट से हमारा हाथ उठ जाता है। इसी प्रकार, कोई विपरीत भावना हमारे मन में आ रही है तो उसी समय उसे मन से निकालना जरूरी है। यह तभी सम्भव होता है जब हमें परमात्मा का अहसास होता है। फिर हम सजग रहते हैं और मन को रोगी होने से बचा लेते हैं।
संतजन लगातार ऐसे वचन हम तक पहुंचाते हैं ताकि हम उन पर गौर करें, उन पर चलें ताकि हमारा भला हो। अगर हम, उनके वचनों के प्रति सजग हो जायेंगे तो सहज में दूसरों की भलाई का कारण बन जायेंगे। पानी ऊंचाई से ढलान की तरफ स्वयं आ जाता है, उसके लिए कोई जोर नहीं लगाना पड़ता लेकिन जब नीचे से ऊपर टंकी तक पानी ले जाना हो तो जोर लगाना पड़ता है।