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परि और आवरण के संयोग से बंटा है पर्यावरण शब्द: डॉ. जीतराम भट्ट
March 17, 2019 • Delhi Search

नई दिल्ली, ऋग्वेदकाल से लेकर आज तक संस्कृत भाषा के माध्यम से सभी प्रकार के वाङ्मय का निर्माण होता आ रहा है। हिमालय से लेकर कन्याकुमारी के छोर तक किसी न किसी रूप में संस्कृत का अध्ययन अध्यापन अब तक होता चल रहा है। इस भाषा में धार्मिक, साहित्यिक, आध्यात्मिक, दार्शनिक, वैज्ञानिकी आदि प्रायः समस्त प्रकार के विषयों का अध्ययन अध्यापन कराया जाता था। पर्यावरण शब्द परि और आवरण के संयोग से बना है। परि का आशय चारों ओर तथा आवरण का आशय परिवेश है। दूसरे शब्दों में कहें तो पर्यावरण अर्थात वनस्पतियों, प्राणियों, और मानव जाति सहित सभी सजीवों और उनके साथ संबंधित भौतिक परिसर को पर्यावरण कहतें हैं संस्कृत साहित्य में प्र्यावर के प्रति जागरूकता के लिये प्राचीन काल से ऋषियों ने असके महत्व को समझा है और अपने ग्रन्थों के द्वारा आम लोगों को जागरूक करने का प्रयास किया।

वेद, पुराण उपनिषदों में पर्यावरण के वारे में बहुत कुछ लिखा गया है। वास्तव में पर्यावरण में वायु, जल, भूमि, पेड़-पौधे, जीव-जन्तु, मानव और उसकी विविध गतिविधियों के परिणाम आदि सभी का समावेश होता हैं। विज्ञान के क्षेत्र में असीमित प्रगति तथा नये आविष्कारों की स्पर्धा के कारण आज का मानव प्रकृति पर पूर्णतया विजय प्राप्त करना चाहता है। इस कारण प्रकृति का संतुलन बिगड गया है। वैज्ञानिक उपलब्धियों से मानव प्राकृतिक संतुलन को उपेक्षा की दृष्टि से देख रहा है। दूसरी ओर धरती पर जनसंख्या की निरंतर वृद्धि, औद्योगिकीकरण एवं शहरीकरण की तीव्र गति से जहाँ प्रकृति के हरे भरे क्षेत्रों को समाप्त किया जा रहा है।

ये विचार दिल्ली संस्कृत अकादमी दिल्ली सरकार एवं डॉ. गोस्वामी गिरधारी लाल शास्त्री प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान के संयुक्त तत्वाधान में झण्डेवालान करोल बाग में आयोजित परिर्यावरण संरक्षण के उपाय विषय पर आयोजित संगोष्ठी का शुभारम्भ करते हुए अकादमी के सचिव डॉ. जीतराम भट्ट ने व्यक्त किये। डॉ. भट्ट ने आगे कहा कि अपने पर्यावरण को बेहतर बनाने के लिए हमें सबसे पहले अपनी मुख्य जरूरत जल को प्रदूषण से बचाना होगा। कारखानों का गंदा पानी, घरेलू, गंदा पानी, नालियों में प्रवाहित मल, सीवर लाइन का गंदा निष्कासित पानी समीपस्थ नदियों और समुद्र में गिरने से रोकना होगा। कारखानों के पानी में हानिकारक रासायनिक तत्व घुले रहते हैं जो नदियों के जल को विषाक्त कर देते हैं, परिणामस्वरूप जलचरों के जीवन को संकट का सामना करना पड़ता है।

इस अवसर पर शिक्षा निदेशालय के पूर्व आचार्या डॉ. भास्करानन्द पाण्डेय ने कहा कि आज वायु प्रदूषण ने भी हमारे पर्यावरण को बहुत हानि होती है। जल प्रदूषण के साथ ही वायु प्रदूषण भी मानव के सम्मुख एक चुनौती है। माना कि आज मानव विकास के मार्ग पर अग्रसर है परंतु वहीं बड़े-बड़े कल-कारखानों की चिमनियों से लगातार उठने वाला धुआं, रेल व नाना प्रकार के डीजल व पेट्रोल से चलने वाले वाहनों के पाइपों से और इंजनों से निकलने वाली गैसें तथा धुआं, जलाने वाला हाइकोक, ए.सी., इन्वर्टर, जेनरेटर आदि से कार्बन डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन, सल्फ्यूरिक एसिड, नाइट्रिक एसिड प्रति क्षण वायुमंडल में घुलते रहते हैं।

इस अवसर पर मृत्युन्जय कुमार ने कहा कि सही मायनों में पर्यावरण पर हमारा भविष्य आधारित है, जिसकी बेहतरी के लिए ध्वनि प्रदूषण को और भी ध्यान देना होगा। अब हाल यह है कि महानगरों में ही नहीं बल्कि गांवों तक में लोग ध्वनि विस्तारकों का प्रयोग करने लगे हैं। बच्चे के जन्म की खुशी, शादी-पार्टी सभी में डी.जे. एक आवश्यकता समझी जाने लगी है। जहां गाँवों को विकसित करके नगरों से जोड़ा गया है।