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दैनिक शाखा एवं वर्षो की कठोर साधना से तैयार होते हैं संघ के स्वयंसेवक:विजय नड्डा
August 3, 2019 • Delhi Search

पिछले दिनों  पंजाब प्रान्त के संघ शिक्षा वर्ग प्रथम वर्ष में होशियारपुर जाने का सुअवसर प्राप्त हुआ। वर्ग में संघ में स्वयंसेवक की संकल्पना विषय पर स्वयंसेवकों से बात करना मेरे जिम्मे था। इस विषय पर चिंतन करते करते मन में आए विचार ही इस लेख की विषय सामग्री है। जून की इस भयंकर गर्मी में जहां लोगों को अपने एसी वाले घरों में रात बिताना कठिन हो रहा है , सुहावने मौसम की तलाश में मनाली जैसे स्थानों की ओर भागते देखे जा सकते हैं, ऐसे में पंजाब के 139 स्वयंसेवक सवेरे 4 बजे से रात्रि 10.30 बजे की कठोर दिनचर्या में  प्रशिक्षण ले रहे हैं। इन स्वयंसेवकों का प्रशिक्षण ठीक प्रकार से हो सके इसके लिए 20 शिक्षक एवं 30 प्रबन्धक अपनी सेवाएं दे रहे हैं। बहुत कम लोगों को जानकारी होगी कि संघ में शिक्षार्थी स्वयंसेवक ही नहीं बल्कि शिक्षक और प्रबन्धक भी वर्ग में रहने और खाने पीने का शुल्क स्वयं की जेब से देते हैं। इससे बड़ा पागलपन और कहाँ मिल सकता है? लेकिन स्वयंसेवकों के इसी पागलपन के कारण आज देश करवट बदलता दिखाई दे रहा है। इसी पागलपन ने देश का भाग्य संवारने के भगीरथी प्रयास को आगे बढ़ाने में असंख्य ज्ञात और अज्ञात नररत्न दिए हैं। जब कभी स्वतंत्र भारत का इतिहास लिखा जाएगा तो संघ की इस देन को इतिहास में बहुत बड़ी आहुति के रूप में जाना जाएगा। आज देश दशकों की निद्रा से जग कर अंगड़ाई ले कर खड़ा होता हुआ दिखाई दे रहा है तो इसके पीछे कितने ही इन पागल लोगों की मूक त्याग  तपस्या और बलिदान  दिखाई देगा। आज भी स्वयंसेवकों को अपने घर परिवार एवं दोस्तों से यही सुनने को मिलता है, क्या पागल हो गए हो? आखिर मिलता क्या है आप को वहां जा कर ? यही प्रश्न और ताने कभी क्रांतिकारियों को भी सुनने को मिलते थे। प्रसिद्ध क्रांतिकारी राम प्रसाद बिस्मिल इन्हीं तानों के जबाब में कह उठे थे- 
इन्हीं बिगड़े दिमागों में खुशियों के लच्छे हैं।
हमें पागल ही रहने दो हम पागल ही अच्छे हैं।।
स्वामी विवेकानन्द कहते थे कि संसार का इतिहास इन्हीं चंद पागल लोगों का इतिहास है। शेष तो इस पृथ्वी पर सन्तान वृद्धि ही कर पाते हैं।
👍दूर या बाहर से संघ को समझना अत्यंत कठिन - ऐसा कहा जाता कि संसार में बहुत बार सबसे आसान बातों को समझना ही सबसे कठिन हो जाता है। औऱ यह कठिनाई सामान्य  व्यक्ति से ज्यादा बड़े बड़े लोगों के लिए होती है। न्यूटन के सम्बद्ध में एक प्रसंग चलता है। इन्होंने एक बिल्ली पाल रखी थी। वे इस बिल्ली से बहुत स्नेह करते थे। बिल्ली भी इनके आगे पीछे , कभी कमरे के अंदर कभी बाहर आती जाती रहती थी। इस कारण इन्हें बार बार उठ कर दरवाजा खोलना पड़ता था। इन्होंने नॉकर को कह कर दीवार में छेद करवा दिया ताकि बिल्ली अंदर बाहर आ जा सके। कुछ दिन ठीक चलता रहा। कुछ समय बाद बिल्ली ने बच्चा दे दिया। न्यूटन को चिंता हुई कि छोट बच्चा बड़े छेद से कैसे अंदर बाहर जाएगा? उन्होंने नॉकर को बच्चे के लिए छोटा छेद करने को कहा। हैरान परेशान नॉकर समझाता रहा कि साहब! बड़े छेद से छोटे बच्चे को निकलने में कोई कठिनाई नहीं होगी। लेकिन बड़ी वैज्ञानिक गणनाओं में खोए उस महान वैज्ञानिक को नॉकर की बात नहीं समझ आई। और वे बिल्ली के बच्चे के लिए छोटा छेद करवा कर ही माने । ऐसे ही अनेक बार संघ को समझने का विषय आता है। सामान्य व्यक्ति ही नहीं बड़े बड़े लोग भी संघ सृष्टि की सामान्य बातें समझने में असमर्थ दिखते हैं। संघ सृष्टि से अनजान लोगों के लिए यह दृश्य किसी स्वप्न से कम नहीं है। लेकिन जो लोग संघ को जानते हैं उनके लिए यह समान्य बात है। संघ के स्वयंसेवकों में जो गुण, निष्ठा, समाज एवं देश के प्रति जो दर्द, जो अपनापन दिखाई देता है उसके पीछे यही साधना व तपस्या है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि स्वयंसेवकों की  इस तपस्या में उनके साथ संघ के वरिष्ठ अधिकारी भी सहज भाव से शामिल होते देखे जा सकते हैं। वही सामान्य रहन- सहन, भोजन एवं कठोर दिनचर्या ! लक्ष्य समर्पित, निस्वार्थ एवं  शुद्ध चारित्र्य सम्पन्न राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक तैयार होने के पीछे दशकों की यह कठोर लेकिन मौन साधना है। आज सामान्य स्वयंसेवक से ले कर देश को चलाने वाले सब संघ की इसी भठी से निकले हीरे मोती हैं। यह भी जानने योग्य है  कि सार्वजनिक जीवन में  जितने चेहरों को लोग जानते हैं, उनके त्याग व समर्पण का लोहा मानते हैं उनसे कई गुणा अधिक पद, प्रतिष्ठा, मंच, माइक से कोसों दूर - तेरा वैभव अमर रहे मां हम दिन चार रहें न रहें ' मंत्र के साथ साधनारत हैं। जो लोग संघ को ले कर बड़ी बड़ी बातें करते हैं उन्हें शायद इस साधना की जानकारी नहीं रहती। किसी ने ठीक ही कहा है- 
 लोगों ने मेरी बुलंदियों को देखा!
मेरे पांव के छालों को किसी ने नहीं देखा!!
👍सब चाहते हैं स्वयंसेवक जैसे समर्पित लोग - संघ के स्वयंसेवक प्रारम्भ से ही प्रत्येक  राजनेता, राजनैतिक दल एवं सामाजिक संगठन के लिए ईर्ष्या का केंद्र रहे  हैं। मजेदार बात है कि संघ के स्वयंसेवकों के प्रति दीवानगी के शिकार संघ का विरोध करने वाले, संघ को जी भर कोसने वाले भी हैं। संघ के प्रति उनके आक्रोश एवं गालियों के पीछे भी अपने पास ऐसे समर्पित कार्यकर्ताओं की कमी ही होती है।  यह हताशा समय समय पर संघ विरोधी नेताओं द्वारा प्रकट होती भी रहती है। अभी हाल ही में बंगाल की मुख्यमंत्री सुश्री ममता बनर्जी ने संघ के विरुद्ध अपना आक्रोश एवं गुस्सा व्यक्त करने साथ साथ ऐसे लोग तैयार करने का संकल्प भी जाहिर किया है। कहने की आवश्यकता नहीं कि संघ के स्वयंसेवकों से पंजा लड़ा के, हर बार  मात खाने के बाद गुस्से एवं हताशा में संघ का क्लोन तैयार करने का ऐसा संकल्प स्व. संकल्प संजय गांधी से लेकर अनेक संघ विरोधी कर चुके हैं। लेकिन हर बार सबको असफलता ही हाथ लगी है। इस असफलता को समझने के लिए संघ के स्वयंसर्वकों को तैयार करने के पीछे संघ का उच्च लक्ष्य, स्वयंसेवक तैयार करने के लिए जीवन का सर्वस्व न्योछावर करने वाले हजारों प्रचारक व गृहस्थी कार्यकर्ताओं की कई  दशकों की साधना का परिणाम है। जितना बड़ा लक्ष्य होय है और उस लक्ष्य के लिए जितनी त्याग, समर्पण व बलिदान करने की सिद्धता होगी वैसा ही तो परिणाम आएगा। आज पढ़े- लिखे, सुशील एवं अच्छी नॉकरी या व्यवसाय करने वाले युवा अपनी बेटी के लिए जैसे वर के रूप में  हर माता पिता की पसंद होते हैं वैसे ही संघ के स्वयंसेवक प्रत्येक नेता, दल  एवं संगठन की चाहत बन चुके हैं। 
👍लीक से हट कर है संघ की स्वयंसेवक की संकल्पना- संघ संस्थापक डा. हेडगेवार ने स्वयंसेवक को ले कर उस समय प्रचलित अवधारणा को बदल दिया। उन दिनों स्वयंसेवक को केवल नेताओं के लिए मंच, माइक एवं दरियों आदि की व्यवस्था करने वाला ही माना जाता था। महात्मा गांधी जी दिसम्बर 1934 में वर्धा में संघ शिविर में गए। स्वयंसेवकों से बातचीत कर अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्हीने डा. साहब से पूछा कि यह सब आपने कैसे कर दिखाया? डा साहिब ने समझाया कि हमारे यहां स्वयंसेवक और अधिकारी ऐसी दो अलग श्रेणियां नहीं हैं । यहां प्रत्येक स्वयंसेवक है। योग्यता एवं समय समर्पण के आधार पर काम दिया जाता है। अधिकारी मतलब अधिक परिश्रम, अधिक कष्ट उठाने वाला होता है। संघ में दायित्व को ले कर संघर्ष या होड़ न होने का बड़ा कारण संघ की यही परम्परा है।
👍पद, प्रतिष्ठा, मंच माइक से दूर - संघ में स्वयंसेवक को पद, प्रतिष्ठा, मंच एवं माइक से दूर रहने को कहा जाता है। यही कारण है कि लाखों स्वयंसेवक समाज सेवा में अपना सहज कर्तव्य समझ कर मौन साधनारत रहते हैं। प्रारम्भ में तो संघ स्वयंसेवकों द्वारा होने वाले युद्ध के समय मोर्चे पर सेना के साथ कंधे से कंधा मिला कर किए सेवा कार्य या बाढ़ -आपदा के समय किए गए  सेवा कार्यों के प्रचार की भी अनुमति नहीं देता था।  पर्रस्थिति की मांग के कारण प्रचार विभग प्रारम्भ हुआ है लेकिन फिर भी व्यक्ति के प्रचार के स्थान पर विचार के प्रचार्  का आग्रह किया जाता है। संघ में मौन रह कर कार्य करने को श्रेष्ठ माना जाता है।
👍 निस्वार्थ सेवा - आज सबसे बड़ा संकट बिना लोभ व लालच के किसी से काम करवाना होता है। गत अनेक सदियों में हमारे सामान्य व्यक्ति के खून में  स्वार्थ का वायरस गहरे जम गया है। यही कारण है कि संघ में बिना स्वार्थ के कार्यकर्ता कार्य करते हैं इस बात पर भी लोग सहजता से विश्वास नहीं कर पाते हैं। यहां सामान्य व्यक्ति से बड़े बड़े व्यापारी, उद्योगपति या सरकारी सेवा में अधिकारी सब स्वयंसेवक बिना किसी लालच या स्वार्थ के समाज सेवा में जुटे देखे जा सकते हैं। स्वार्थ के भाव पर गहरी चोट संघ में उसी समय हो जाती है जब पहले दिन से ही अपनी जेब से किराया खर्च कर कार्यक्रम का शुल्क और देना पड़ता है। लेने के बजाए देने का स्वभाव या संस्कार स्वयंसेवक के मन में विकसित होना प्रारम्भ हो जाता है। 
👍संगठन मंत्र के साधक - हमारे समाज में आज साथ मिल कर काम करने का स्वभाव लुप्त प्रायः सा दिखता है। हर व्यक्ति अपने अंहकार संसार से बाहर आने को तैयार नहीं है। इसी कारण संगठन, राजनैतिक दल ही नहीं तो मठ मन्दिर की सम्भाल के लिए बनी समितियों में तोड़ फोड़ आम देखी जा सकती है। संघ स्वयंसेवक को संगठन शास्त्र का तज्ञ माना जाता है। अपना अहम समाप्त कर साथी सहयोगी लोगों को साथ लेकर चलने में स्वयंसेवक के गुण के विरोधी भी कायल हैं। स्व.एकनाथ रानाडे हों या पंडित दीनदयाल उपाध्याय अपने संगठन कुशलता के आधार पर शून्य से सृष्टि करने को ले कर अपनी प्रतिभा का लोहा मानव चुके हैं।
👍सामाजिक समरसता के उपासक स्वयंसेवक - अंग्रेज द्वारा बोए गए विष बीज आज हर कहीं और कभी भी सिर उठाए दिख जाते हैं। कई बार तो समाज शास्त्री यह सब देख कर चिन्तित और परेशान हो उठते हैं। राजनीति इसमे खुल कर अपना रंग दिखाती है। ऊंच नीच, अमीर गरीब, उतर दक्षिण एवं भाषा जैसे अनन्त विषयों पर समाज को बांटने का खेल चलता रहता है। इस सारी परिस्थिति में संघ का स्वयंसेवक एक जन - एक राष्ट्र का संजीवनी मंत्र लेकर समरसता का भाव फैलाते देखे जा सकते हैं। सब भारत मां की सन्तान होने के कारण  हम में भेद कैसा? स्वयंसेवक के निष्पाप साधना के कारण समाज स्वयंसेवक की बात पर विश्वास भी करता है। सन 2006में संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरू जी के जन्म शताब्दी वर्ष में समाजिक समरसता के लिए सन्त सम्मेलनों का आयोजन करना तय किया। उन सम्मेलनों में हमने संतों से ऐसे सम्मेलन अपने निमंत्रण पर स्तर पर करने का निवेदन किया। कार्यक्रम के बाद लगभग सभी संतों का कहना था कि ये लीग आपके बुलाने पर आ गए। हमारे लग्रह पर ये लोग नहीं आएंगे। यही स्थिति लगभग जाति विरादरी सम्मेलन की थी। 
👍राष्ट्र प्रथम है- स्वयंसेवक की साधना का केंद्र - 'भला हो जिसमे देश का काम सब किए चलो' संघ शाखाओं में यह गीत चलता है। वास्तव में स्वयंसेवक के इस मनोभाव के कारण संघ के विरोधी भी संघ के दीवाने रहते हैं। देश के दुर्भाग्य विभाजन के समय स्वयंसेवकों द्वारा कांग्रेसी नेताओं की सुरक्षा ही या आपातकाल में विरोधी राजनेताओं जी सहायता इन सबमे स्वयंसेवकों ने सबसे आगे रह कर अपने कर्तव्य का निर्वहन किया है। देश के हित में चलने वाले हर कार्य को स्वयंसेवक का समर्थन रहता है। देश से सुखद भविष्य के लिए ऐसे राष्ट्र समर्पित स्वयंसेवकों के निर्माण की प्रक्रिया और गति पकड़ती रहे, यह समय जी मांग है।
 लेखक -विजय नड्डा 
क्षेत्रीय संगठन मंत्री 
विद्या भारती (उत्तर क्षेत्र )