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जरूरी है कि हमारे विचार भी पावन हों
January 31, 2019 • Delhi Search

सत्गुरु माता सुदीक्षा जी महाराज निरंकारी बाबा हरदेव सिंह

गारा सूखी घास खाकर भी अमृत जैसा दूध देती है लेकिन अगर सांप को अमृत जैसा दूध भी दिया जाए तो भी वह जहर ही देता है। दोनों में कितना अंतर है। दुनियावी दृष्टि से देखें कि एक झोपड़ी में रहने वाला भक्त है जिसके पास दुनियावी रूप से सामर्थाएं भी नहीं हैंलेकिन फिर भी वह डंसता नहीं है, जहर नहीं बांटता है, हमेशा अमृत देता है, प्यार देता है। दूसरी तरफ, एक साकत इंसान को सभी सांसारिक पदार्थ प्राप्त हैं, फिर भी वह डंसता है, वह जहर ही बांटता है। इसलिये, जरूरी है कि हमारे विचार भी पावन हों और मन में भी प्रेम, करुणा, |दया, मिलवर्तन वाले भाव हों, कहीं पर भी विषैलापन न हो।युगों-युगों से संतजनों ने यही प्रेरणा दी कि है इंसान, तुम भी विचार करो कि तुम किस रास्ते पर चल रहे हो? तुम्हारी कौन सी अवस्था है? । तुम्हारे जीवन की चाल कैसी है, इसका मूल्यांकन करो। जैसे आइने के सामने खड़े होकर अपने बिखरे बाल संवार लेते हो, चेहरे पर लगा दाग पोंछ लेते हो, कपड़ों पर लगी गंदगी झाड़ लेते हो, इसी प्रकार अंतर्मन में झांक कर अपनी अवस्था को भी सुंदर रूप प्रदान करो। अगर भावनाएं सुंदर हो जायें, विचार सुंदर हो जाये तो फिर कदम विनाश के लिये नहीं, कल्याण के लिये बढ़ेंगे। फिर तन का भी सदुपयोग होगा, धन का भी सदुपयोग होगा। अज्ञानता के कारण इंसान परमात्मा के नाम पर एक-दूसरे से लड़ रहे हैं, मारकाट कर रहे हैं, वह छोटे-छोटे बच्चों पर भी 'दया करने को तैयार नहीं । संतजनों ने यही पैगाम दिया कि सत्य परमात्मा को जान लो ताकि धरती पर प्रेमपूर्वक जीवन बिता सको। अगर जीवन में प्रेम है तभी वह सही अर्थों में जीवन कहलाने लायक है। यदि प्रेम ही नहीं तो इंसान एक जिंदा लाश के समान है। केवल हृदय के धड़कने और श्वांसों के चलने का अर्थ यह नहीं है कि इंसान जीवित है। इंसान जीवित तभी माना जाता है जब उसके दिल में मानवमात्र के लिए प्रेम विद्यमान होता है। जिस पल इंसान प्रेम करना भूल जाता है, वह जाति, धर्म, रंगरूप के आधार पर नफरत करने लगता है, उसी पल वह धरती पर बोझ बन जाता है। पीर-पैगम्बरों ने मानवता को बचाने की पुरजोर कोशिश करते हुए कहा कि इंसानों के बीच दीवारों की बजाय पुलों का निर्माण हो ताकि दिलों के बीच संवाद कायम हो सके। चाहे किसी भी संस्कृति का हो, चाहे कोई भी भाषा बोलने वाला हो, चाहे कोला हो या गोरा, इंसान सभी को गले से लगाए, तभी धरती का स्वर्ग बनना संभव हो पाएगा। इंसान सारा जीवन सांसारिक उपलब्धियों को प्राप्त करने में इस प्रकार मग्न हो जाता है कि जिस जरूरी काम को करने के लिए उसे मानव जन्म प्राप्त हुआ। था, उसे पूरा करने की ओर उसका ध्यान । ही नहीं जाता, इसलिए उसकी आत्मा का उद्धार नहीं हो पाता, सारी उम्र दूसरों को पीड़ा देने और भेदभावों की दीवारें खड़ी करने में ही गुजर जाती है।