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अगर हम प्रभु की खुशी प्राप्त करना चाहते है..........
February 11, 2019 • Delhi Search

उनकी वाणी वहां पर चलती है, वहां पर लोग श्रद्धा से पढ़ते हैं, सुनते हैं। इन सभी महापुरुषों के वचन हम पढ़ लें, सुन लें, उससे एक ही भावना मिलेगी कि प्रभु परमात्मा के साथ हमने प्रेम का नाता जोड़ना है,

और उसके बनाए हुए बंदों से प्रेम करना है, उसके बनाए हुए बंदों को गले लगाना है, उनको ठुकराना नहीं। जिस तरह से एक मां को खुश करना हो, मां का दिल जीतना हो, मां के दिल में अपना ध्यान बनाना हो, तो मां के बच्चे को प्यार करना पड़ता है अगर हम बच्चे को तो कुचल दें, ठुकरा दें, लेकिन मां के पास जाकर कहें कि तू बहुत दयालु है, तू तो बहुत कृपालु है, तेरे चेहरे पर तो बड़ा तेज चकमता है, जितने भी तारीफके शब्द हम कह सकते हैं, इस मां को कह सुनाएं, लेकिन हम उम्मीद छोड़ दें, यह ख्याल छोड़ दें कि वह खुश होगी। वह कहेगी, मेरे जिगर । के टुकड़े को तो कुचलता है, मेरे बेटे को तो ठुकराता है और मेरी बड़ी तारीफकरता। है। वह मां उससे कभी खुश नहीं हो सकती। दूसरी तरफ अगर वह इंसान बच्चे को उठा

लेता है, गले लगा लेता है, प्यार करता है, उससे मीठे बोल बोलता है और मां दूर खड़ी । देख रही है, वह मां के पास जाकर उसकी । तारीफे न भी करे, उसके पास वे शब्द, वे । अल्फाज न भी कहे, फिर भी वह मां का दिल जीत लेता है। इसी तरह अगर हम प्रभु की खुशी प्राप्त करना चाहते है, तो वह हमने भी सबसे प्यार करना है। हम पाठ पूजा करते हैं, हम समाधियां लगाते हैं, हम सुगंधियां लगाते हैं, हम दान करते हैं, स्नान करते हैं, पुण्य करते हैं। पूछा जाये, क्यों करते हैं? जी, हम तो प्रभु को खुश करना चाहते हैं। क्या प्रभु इन बातों से ही खुश हो जायेगा? संसार में इस जीवन के सफर को तय करने के लिए इंसान बहुत कुछ करता है, अपने सजने-संवरने के लिए अपने जिस्म, अपने शरीर, अपने चेहरे को संवारने के लिए बहुत कुछ करता है और इसके साथ टोपी, पगड़ी, पहनावे, वेशभूषा आदि भी जुड़ जाते हैं, मगर यह पहचान सत्य नहीं होती, वास्तविक अस्तित्व नहीं होती है। इंसान का वास्तविक अस्तित्व तो आत्मा के रूप में है, आत्मा जिसके कारण ये शरीर, ये मन चलता है, जिस आत्मा के कारण ये जीवन, जीवन कहलाता है। आत्मा चेतन ऊर्जा है। यह परमात्मा का अंश है, इसका अस्तित्व परमात्मा से है। इंसान में आत्मा हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई नहीं बल्कि इसकी पहचान मूल शक्ति परमात्मा से ही है। आत्मा का नाता इस जिस्म से टूटता हैतो आंखें होते हुए भी ये देख नहीं सकतीं, हाथ होते हुए भी कुछ कार्य नहीं कर पाते, दिल भी अंदर होता है, और भी शरीर के सारे अंग यथावत होते हैं लेकिन कुछ भी काम नहीं करता क्योंकि आत्मा का नाता टूट गया। शरीर तो है लेकिन ऊर्जा नहीं है, क्षमता नहीं है, ताकत नहीं है। जो वो ऊर्जा थी उसका तो नाता टूट गया तो सब कुछ जड़ हो गया, जो चलते-फिरते थे, जो कहते थे कि ये चेतन है लेकिन अब नाता टूटा है, अब तो ये जड़ को रूप हो गया।

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